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पहली बारिश और एक अधूरी चिट्ठी
सोलह की उम्र, एक छोटा शहर, और वो चिट्ठी जो मैंने कभी भेजी नहीं।
मुसाफ़िर
1 min readUpdated
हमारे कस्बे में बारिश हमेशा देर से आती थी, पर उस साल जून के पहले हफ़्ते में ही बादल फट पड़े। मैं स्कूल से लौट रहा था और वो साइकिल की घंटी बजाता हुआ मेरे पास रुका — "भीग जाओगे, बैठो।"
उस दिन से हम रोज़ साथ लौटने लगे। वो ज़्यादा बोलता नहीं था, पर जब हँसता था तो लगता था जैसे पूरी गली में रोशनी हो गई हो। मुझे नहीं पता था कि जो मैं महसूस कर रहा हूँ उसका कोई नाम भी होता है। बस इतना पता था कि उसके बिना रास्ता लंबा लगता था।
दिसंबर में मैंने उसे एक चिट्ठी लिखी। तीन रातें लगीं। हर लाइन को दस बार काटा। आख़िर में बस इतना लिखा — "तुम्हारे साथ चलना मुझे अच्छा लगता है। शायद उससे ज़्यादा, जितना लगना चाहिए।"
वो चिट्ठी आज भी मेरी पुरानी डायरी में रखी है। भेजने की हिम्मत कभी नहीं हुई। कुछ साल बाद वो पढ़ाई के लिए बाहर चला गया, और मैं अपने शहर में रह गया।
आज अट्ठाईस का हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर भेज दी होती तो? पर अब डर नहीं लगता। अब जानता हूँ कि उस सोलह साल के लड़के ने कुछ ग़लत नहीं किया था — उसने बस प्यार किया था। अगर तुम भी कोई ऐसी चिट्ठी छुपाकर बैठे हो, तो याद रखना: तुम्हारा दिल ग़लत नहीं है।
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मुसाफ़िर
छोटे शहर से, बड़े सपनों के साथ। वो कहानियाँ लिखता हूँ जो सत्रह की उम्र में पढ़नी थीं।
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22 commentsReader 900221
Everyone has that one unsent letter. Thank you for being brave enough to write about yours.
Reader 549094
Chitthi wala part padh ke apni school diary yaad aa gayi. Bahut pyaari kahani hai.