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दादी की लाठी और मेरा सच
गाँव में सबसे सख़्त मानी जाने वाली दादी ने वो किया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।
पहाड़ी दिल
1 min readUpdated
हमारे पूरे गाँव में दादी से सब डरते थे। लाठी लेकर चलती थीं, और उनकी एक आवाज़ पर बच्चे क्या, बड़े भी चुप हो जाते थे।
जब गाँव में ये बात फैली कि मैं शहर में किसी लड़के के साथ रहता हूँ, तो कुछ बड़े-बुज़ुर्ग हमारे घर आ गए। पिताजी सिर झुकाए बैठे थे। एक आदमी ने ऊँची आवाज़ में कहा कि ऐसे लड़के से गाँव की बदनामी होती है।
दादी अपने कमरे से निकलीं, लाठी ज़मीन पर ठोकी और पूछा, "किसकी बदनामी? मेरे पोते ने चोरी की है? किसी को धोखा दिया है?"
कोई कुछ नहीं बोला।
"जिस दिन ये झूठ बोलेगा, उस दिन मुझसे शिकायत करना," दादी ने कहा। "आज आप लोग चाय पीजिए और अपने घर जाइए।"
वो लोग चले गए। उस शाम दादी ने मुझे फ़ोन किया — पहली बार, क्योंकि उन्हें फ़ोन चलाना पसंद नहीं था। बस इतना कहा, "अगली बार उस लड़के को भी लेकर आना। देखूँ तो कौन है जिसके लिए तू इतना ख़ुश रहता है।"
हम दिवाली पर गए। दादी ने उसे अपने हाथ से खीर खिलाई।
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पहाड़ी दिल
उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव से। पहाड़ों जितनी ख़ामोशी, नदी जितनी बातें।
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66 commentsपहाड़ी दिलWriter
आप सबका दिल से शुक्रिया। आपके शब्दों ने मेरा दिन बना दिया।
Reader 145446
आपकी लेखनी में जादू है। अगली कहानी का इंतज़ार रहेगा।
Reader 718831
आख़िरी लाइन दिल को छू गई। और लिखिए, हम पढ़ रहे हैं।
Reader 135659
पढ़ते-पढ़ते आँखें भर आईं। इतनी सच्ची कहानी के लिए शुक्रिया।
Gulmohar
कितनी हिम्मत चाहिए ये सब लिखने के लिए। आपको सलाम।
Chai aur Chapters
Share kar diya apne group mein. Sabko padhni chahiye yeh kahani.