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थेरेपिस्ट का पहला सवाल
मुझे लगता था मैं टूटा हुआ हूँ। पहली ही मुलाक़ात में किसी ने कहा — तुम टूटे नहीं, थके हुए हो।
मुसाफ़िर
1 min readUpdated
दो साल तक मैं हर सुबह उठकर यही सोचता था कि आज का दिन कैसे निकलेगा। दफ़्तर में सब ठीक दिखाता, घर पर फ़ोन पर हँसकर बात करता, और रात को छत की तरफ़ देखता रहता।
एक दोस्त ने ज़िद करके मुझे एक काउंसलर के बारे में बताया, जो क्वीयर लोगों के साथ काम करती थीं। पहली मुलाक़ात के लिए मैं तीन बार अपॉइंटमेंट टाल चुका था।
जब आख़िर पहुँचा, तो उन्होंने कोई भारी-भरकम सवाल नहीं पूछा। बस इतना कहा, "आज यहाँ तक आने में आपको कितनी हिम्मत लगी?"
मैं रो पड़ा। शायद पहली बार किसी ने माना था कि जो मैं हर दिन कर रहा हूँ, वो आसान नहीं है।
आठ महीने हो गए हैं। सब ठीक नहीं हुआ, पर अब बुरे दिनों के बीच अच्छे दिन भी आते हैं। मैंने सीखा कि मदद माँगना कमज़ोरी नहीं है। अगर तुम भी भीतर ही भीतर थक गए हो, तो किसी से बात करना — दोस्त, काउंसलर, या कोई हेल्पलाइन। तुम अकेले नहीं हो।
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मुसाफ़िर
छोटे शहर से, बड़े सपनों के साथ। वो कहानियाँ लिखता हूँ जो सत्रह की उम्र में पढ़नी थीं।
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33 commentsSahil from Lucknow
❤️❤️
Reader 718831
आपके शब्दों में बहुत अपनापन है। दिल से शुक्रिया।
Bombay Local
🌈🌈