Finding myselfSmall-town lifeहिन्दी
ट्रेन की खिड़की वाली सीट
दिल्ली से घर लौटते हुए एक अजनबी ने मुझसे वो बात कही, जो कोई अपना नहीं कह पाया।
मुसाफ़िर
1 min readUpdated
दिल्ली से घर जाने वाली रात की ट्रेन हमेशा भरी रहती है। उस बार मुझे खिड़की वाली सीट मिली थी और सामने एक पचास-पचपन साल के अंकल बैठे थे — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में एक पुरानी किताब।
रात को जब बाक़ी सब सो गए, उन्होंने पूछा कि मैं क्या पढ़ रहा हूँ। मेरे फ़ोन पर एक क्वीयर कवि की कविताएँ खुली थीं। मैंने घबराकर स्क्रीन बंद कर दी। वो मुस्कुराए और बोले, "छुपाने की ज़रूरत नहीं, बेटा। मैंने भी पूरी उम्र छुपाया है।"
फिर उन्होंने अपनी कहानी सुनाई। एक दोस्त, जिसके साथ वो तीस साल से रहते हैं। घरवालों के लिए वो "रूममेट" हैं। शादियों में अलग-अलग जाते हैं, पर लौटकर एक ही घर में आते हैं।
"हमारे ज़माने में इसके लिए शब्द नहीं थे," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पास शब्द हैं, लोग हैं, हिम्मत है। उसे बर्बाद मत करना।"
सुबह स्टेशन पर उतरते वक़्त उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया। मैंने उनका नाम तक नहीं पूछा। पर उस रात के बाद से जब भी डर लगता है, मैं उस खिड़की वाली सीट को याद करता हूँ — और उस आदमी को, जिसने मुझे बताया कि हम पहले भी थे, और आगे भी रहेंगे।
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मुसाफ़िर
छोटे शहर से, बड़े सपनों के साथ। वो कहानियाँ लिखता हूँ जो सत्रह की उम्र में पढ़नी थीं।
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33 commentsReader 597403
आपकी लेखनी में जादू है। अगली कहानी का इंतज़ार रहेगा।
Reader 135659
ऐसी कहानियाँ पढ़कर उम्मीद बनी रहती है। धन्यवाद।
Sahil from Lucknow
Itna relatable hai yeh. Hum sab ek jaise darr mein jeete hain.