Coming outFamilyहिन्दी
माँ के लिए लिखी एक कविता
जो बात मैं ज़बान से नहीं कह पाया, वो मैंने कागज़ पर लिख दी — और माँ ने उसे फ्रेम करवा लिया।
पहाड़ी दिल
1 min readUpdated
मैं कभी भी अच्छा बोलने वाला नहीं रहा। गाँव की बैठकों में, स्कूल के फ़ंक्शनों में, मैं हमेशा पीछे खड़ा रहता था। पर लिखना मुझे आता था।
जब माँ से वो बात कहने का वक़्त आया, जो मैं सालों से छुपा रहा था, तो मैंने एक कविता लिखी। उसमें किसी लड़की का ज़िक्र नहीं था, किसी शादी का सपना नहीं था। उसमें बस एक लड़का था जो पहाड़ों से, अपनी माँ के हाथ की मंडुए की रोटी से, और एक दूसरे लड़के की हँसी से प्यार करता था।
मैंने वो कविता माँ के तकिये के नीचे रख दी और खेतों की तरफ़ निकल गया। पूरा दिन वापस नहीं आया।
शाम को जब लौटा, तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मेरी थाली में दो रोटियाँ ज़्यादा रख दीं। रात को सोने से पहले बोलीं, "कविता अच्छी थी। और लिखा कर।"
अगले महीने जब मैं शहर से लौटा, तो वो कविता हमारे कमरे की दीवार पर फ्रेम में टँगी थी। गाँव वाले पूछते हैं कि ये किसने लिखी। माँ गर्व से कहती हैं, "मेरे बेटे ने।"
What this story has earned
for its writer
Likes
15 likes
Comments
6 comments
Shares
3 shares
Written by
पहाड़ी दिल
उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव से। पहाड़ों जितनी ख़ामोशी, नदी जितनी बातें।
More from पहाड़ी दिल
More stories
See allHave a story of your own?
Write it under a pen name, in Hindi, English or Hinglish. Readers' likes, comments and shares earn you money.
Comments
77 commentsपहाड़ी दिलWriter
आप सबका दिल से शुक्रिया। आपके शब्दों ने मेरा दिन बना दिया।
Reader 549094
आपकी लेखनी में जादू है। अगली कहानी का इंतज़ार रहेगा।
Gulmohar
ऐसी कहानियाँ पढ़कर उम्मीद बनी रहती है। धन्यवाद।
मुसाफ़िर
Itna relatable hai yeh. Hum sab ek jaise darr mein jeete hain.
Reader 900221
Har line mein itni sachchai hai. Bahut dino baad kuch itna achha padha.
Reader 597403
आख़िरी लाइन दिल को छू गई। और लिखिए, हम पढ़ रहे हैं।
Chai aur Chapters
हर पंक्ति में सच्चाई है। इसे लिखने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।